जब संपादक डरे हों और साहित्य पर 'सेंसरशिप' का पहरा हो: मेरी एक आपबीती
एक लेखक, कवि या रचनाकार का सबसे बड़ा धर्म क्या होता है? अपनी कला और विचारों के प्रति ईमानदार रहना। लेकिन जब मुख्यधारा के बड़े मीडिया घराने खुद अपनी रीढ़ खो चुके हों, तो वे लेखकों से भी अपनी ईमानदारी का सौदा करने की उम्मीद करते हैं।
हाल ही में मेरे साथ एक ऐसी घटना घटी, जिसने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारे देश में स्वतंत्र लेखन के लिए कोई जगह बची भी है या नहीं।
क्या है पूरा मामला?
प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान 'आज तक' के संपादक ने मुझसे उनके आगामी अगस्त अंक के लिए एक विशेष वैचारिक लेख तैयार करने का अनुरोध किया था। विषय बेहद खूबसूरत और आज के समय के लिए प्रासंगिक था— 'कविता, तकनीक और मानवता'। मैंने इस विषय को न्याय देने के लिए देश की 8 बेहद प्रखर और जानी-मानी कवयित्रियों से संपर्क किया और उनके विचारों को आपस में पिरोकर एक बेहतरीन संकलन तैयार किया।
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| अनुपम मिश्रा जी |
इन 8 कवयित्रियों में एक नाम अनुपम मिश्रा जी का भी था। अनुपम जी एक बेहतरीन रचनाकार हैं। संयोग से, वे उन नेहा बोरा की माता जी भी हैं जो इन दिनों जंतर-मंतर पर नीट (NEET) पेपर लीक और धांधली के खिलाफ पिछले 21 दिनों से ऐतिहासिक भूख हड़ताल पर बैठी हैं।
संपादक का फोन और मीडिया का डर
लेख पूरी तरह तैयार हो चुका था और प्रकाशन की प्रक्रिया में था। लेकिन आज सुबह अचानक संपादक महोदय का मेरे पास फोन आया। उन्होंने मुझसे कहा, "लेख में से अनुपम मिश्रा का हिस्सा और नाम हटा दीजिए।"
मैं हैरान रह गई। मैंने पूछा क्यों? जो लेख पूरी तरह से कविता, तकनीक और इंसानी मूल्यों पर आधारित है, उसमें किसी कवयित्री के राजनैतिक या पारिवारिक संदर्भों को लाकर सेंसर क्यों किया जा रहा है? लेकिन संपादक के पास कोई तार्किक जवाब नहीं था, सिवाय एक अघोषित डर के।
यह स्थिति क्या दर्शाती है?
यह घटना आज के कॉर्पोरेट मीडिया की सबसे बदसूरत सच्चाई को उजागर करती है:
1. वैचारिक लाचारी: बड़े मीडिया घरानों के संपादकों के पास अब इतनी भी आज़ादी नहीं बची है कि वे एक विशुद्ध साहित्यिक लेख में किसी ऐसे व्यक्ति को शामिल कर सकें, जिसका परिवार व्यवस्था से सवाल पूछ रहा है।
2. कला पर राजनीति का हावी होना: एक कवयित्री के विचारों की कीमत उनके शब्दों से नहीं, बल्कि इस बात से तय हो रही है कि उनका परिवार किस आंदोलन से जुड़ा है।
3. सत्य से डर: सत्ता और मुख्यधारा का मीडिया आज असहमत आवाज़ों से इतना डरता है कि वह उनके साहित्य को भी दबा देना चाहता है।
मेरा फैसला
एक लेखिका और कवयित्री के तौर पर मैं अपनी कलात्मक ईमानदारी से समझौता नहीं कर सकती। 8 कवयित्रियों के विचारों का यह गुलदस्ता तभी पूरा है जब उसमें अनुपम जी के विचार भी शामिल हों। किसी के राजनैतिक डर के कारण मैं अपने लेख के मूल स्वरूप को विकृत करने की अनुमति कभी नहीं दउंगी।
मैंने यह तय किया है कि मैं इस लेख को 'आज तक' में संशोधित रूप में छपने के लिए नहीं दूँगी। यह लेख अपने मूल और पूर्ण स्वरूप में बहुत जल्द किसी ऐसे स्वतंत्र मंच पर प्रकाशित होगा, जहाँ विचारों की आज़ादी का सम्मान किया जाता है।
मुख्यधारा का मीडिया भले ही अपनी आँखें मूँद ले, लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में पाठकों तक सच पहुँचाने के रास्ते बंद नहीं किए जा सकते। आप सभी के समर्थन की अपेक्षा है।
— विपिन चौधरी (कवयित्री
