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Friday, June 26, 2026

पुरानी डायरी के पन्ने, बदलती दुनिया और दिल को छू गई एक बात...


भूमिका (Intro):

पढ़ने-लिखने का शौक मुझे हमेशा से रहा है। कोई 20 वर्ष पहले, पढ़ते हुए मैंने अपनी डायरी में दुनिया के वर्गीकरण (Classification) को लेकर एक बेहद ज्ञानवर्धक जानकारी नोट की थी और साथ में एक नक्शा भी सहेज कर रखा था। आज जब मैंने अपनी पुरानी डायरी के उन पन्नों को पलटा, तो मुझे लगा कि यह इतिहास आज की पीढ़ी के साथ भी साझा किया जाना चाहिए ताकि हम समझ सकें कि हमारी दुनिया कितनी बदल चुकी है।

मेरी डायरी के पन्नों से (20 वर्ष पुराना नोट)

शीत युद्ध (Cold War) के दौर में दुनिया को समझने के लिए 'Three-World Model' (तीन दुनिया का दिल्ली मॉडल) इस्तेमाल किया जाता था। इस मॉडल के अनुसार पूरी दुनिया चार हिस्सों में बंटी हुई थी:

1. First World (पहली दुनिया): अमेरिका के प्रभाव वाले लोकतांत्रिक और औद्योगिक पूंजीवादी देश (जैसे- उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया)।

2. Second World (दूसरी दुनिया): सोवियत संघ (USSR) के प्रभाव वाले कम्युनिस्ट-समाजवादी राज्य (जैसे- रूस, चीन और पूर्वी यूरोप)।

3. Third World (तीसरी दुनिया): वे देश जो किसी भी गुट में शामिल नहीं थे और विकासशील थे (जैसे- एशिया, अफ्रीका और लाटिन अमेरिका के देश)।

4. Fourth World (चौथी दुनिया): यह शब्द 1970 के दशक में 'First Nations' यानी विभिन्न देशों की सीमाओं के भीतर रहने वाले मूल निवासियों और आदिवासी समुदायों के लिए इस्तेमाल किया गया था।

(नीचे दी गई तस्वीर इसी पुराने मॉडल को दर्शाती है) 



तीसरी दुनिया का नक्शा 

आज की स्थिति: क्या बदला?

समय के साथ वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी है। आज के दौर में यह पुराना मॉडल पुराना और अप्रासंगिक (outdated) हो चुका है। आज की हकीकत कुछ इस तरह है:

'Second World' का अंत: 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही वैचारिक रूप से 'दूसरी दुनिया' का अस्तित्व समाप्त हो गया। आज चीन और रूस जैसे देश अपने अलग आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव रखते हैं।

'Third World' से 'Global South' का सफर: आज विकासशील देशों के लिए 'थर्ड वर्ल्ड' जैसा शब्द इस्तेमाल नहीं किया जाता। आज इसकी जगह 'Global South' शब्द का प्रयोग होता है। आज भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस ग्लोबल साउथ की सबसे मजबूत आवाज हैं।

बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World): आज दुनिया किसी एक या दो महाशक्तियों के इशारे पर नहीं चलती। आज शक्ति के कई केंद्र हैं—जैसे भारत, अमेरिका, चीन, यूरोपीय संघ और रूस।

एक विचार, जो दिल को छू गया (यहाँ जोड़ना है)

मेरी डायरी का वह पुराना नोट और नक्शा आज इतिहास का एक सुंदर दस्तावेज बन चुके हैं। इतिहास को सहेजना इसलिए जरूरी है ताकि हम देख सकें कि दुनिया ने कितनी तरक्की की है। लेकिन इस तथाकथित तरक्की के बीच जब हम आज की खबरों को देखते हैं—चाहे वह अमेरिका, इजराइल, या ईरान के बीच चल रहे युद्ध और तनाव हों—तो मन उदास हो जाता है।

कल ही की बात है, मेरी भांजी (जो खुद सिविल हॉस्पिटल में एक फिजियोथेरेपिस्ट है और जिसे मैंने बहुत लाड-प्यार और संघर्षों के साथ पाला-पोसा है) ने वैश्विक हालातों पर एक बहुत छोटी लेकिन बेहद गहरी बात कही। उसने कहा: "कितने पागल हैं, आज के जमाने में भी युद्ध कर रहे हैं!"

उसकी यह बात मेरे दिल को छू गई और मुझे बेहद सच्ची लगी। आज जब इंसान चांद और सितारों तक पहुँच रहा है, तब भी ज़मीन के टुकड़ों और वर्चस्व के लिए इस तरह युद्ध लड़ना और मासूमों की जान लेना सचमुच किसी पागलपन से कम नहीं है। आज की दुनिया को बड़ी-बड़ी महाशक्तियों या मिसाइलों की नहीं, बल्कि इसी मानवीय और संवेदनशील सोच की जरूरत है।

शब्बा खैर!


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